Tuesday, 14 June 2016
टिक्करताल (मोरनी) टू चंडीगढ़ रिटर्न यात्रा
Sunday, 12 June 2016
चंडीगढ़ से मोरनी हिल्स (टिक्कर ताल) यात्रा
वन - वन उपवन -
छाया उन्मन - उन्मन गुंजन
नव वय के अलियों का गुंजन !
रुपहले, सुनहले, आम्र, मौर,
नीले, पीले, औ' ताम्र, भौर,
रे गंध - अंध हो ठौर-ठौर
उड़ पाँति-पाँति में चिर उन्मन
करते मधु के वन में गुंजन !
कवि सुमित्रानंदन पंत जी कि यह प्रकृति का वर्णन करती पंक्तियां मोरनी की पहाड़ियों पर यात्रा के दौरान कई बार ज़हन में आ जाती हैं | सुनसान पहाड़ी रास्ता और प्रकृति का सान्निधय बहुत ही रमणीय और मन को शांत करने वाला है | इसके इलवा मोरनी हरियाणा का एक मात्र हिलस्टेशन और सबसे ऊँचा स्थान है |
मोरनी की पहाड़ियों की ऊंचाई 1220 m है |
मोरनी की पहाड़ियों पर जाने का प्रोग्राम अचानक ही बना | 11 जून को सुबह 10 बजे मोरनी जाने का प्लैन बना | सबसे पहली समस्या गियर वाली साइकिल का जुगाड़ करने की थी | खैर वो कोई कठिन काम न था | एक दयालुह्रदय सीनियर, संदीप चौबे जी की हरक्यूलिस रोडीओ (Hercules Roadeo) मेरी सवारी बनी | दूसरी समस्या यह की साइकिल में bottle holder नहीं था | उसका जुगाड़ तस्मे (shoe lace) से बोतल बांध कर, कर दिया गया |
11 बजे मैं 1 लीटर पानी, कैमरा और मोबाइल के साथ निकल पड़ा |
चंडीगढ़ के सेक्टर 12 से पंचकूला और पंचकूला से हिमालयन एक्सप्रेस वे पे पहुंचा | हिमालयन एक्सप्रेस वे के टोल प्लाज़ा से थोड़ा आगे भगवानपुर (चंडीमंदिर) से दाहिने हाथ (राइट साइड) रायपुर की तरफ मुड़ गया |
धूल भरी सड़क और प्रदूषण मेरे स्वागत के लिए बैठे थे | पहला गांव, "बुर्ज कोटियाँ", क्रुशरों के कहर में अपनी सुंदरता खो चूका है | बहुत सारे क्रेशर तो अब बंद पड़े हैं लेकिन कुल मिला के अगर क्रुशरों की संख्या को देखा जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा की चंडीगढ़, पंचकूला में बन रही बड़ी बड़ी बहुमंज़िला इमारतों के लिए रेत, बजरी यहाँ से ही आती है | क्रेशर ज़ोन की आड़ में 30-40 m तक गहरी खुदाई की जा चुकी है |
खनन का शिकार हुआ बुर्ज कोटियाँ गांव (क्रेशर ज़ोन)
बंद पड़े क्रेशर
खैर चलते चलते मैं थपली पहुंचा | यहाँ से मोरनी तक चढ़ाई है | शुरू के 4 km तो जोश जोश में चढ़ गया, मगर जल्द ही साँस फूल गई | पानी पीने और रेस्ट करने के बाद फिर से चढ़ाई शुरू कर दी | चढ़ाई तीखी थी तो थोड़ी थोड़ी देर बाद रेस्ट करनी पड़ी और इसी चक्कर में मेरा पानी भी ख़त्म हो गया |
जेठ की दोपहर में सड़क से उठती गरम हवा और सर पे पड़ती धूप सारे ग़म भुला देती है |
अपने मन को मजबूत करके मैं चढ़ाई चढ़ गया और आखिर में जा के एक ढाबा दिखा | पानी और दूध पीने के बाद फिर से चढ़ाई शुरू कर दी |
मोरनी पहुँचने के दो रस्ते हैं | एक पंचकूला, नाड़ा साहिब हो के आता है और दूसरा चंडीमंदिर हो के | पंचकूला वाला रास्ता डबल लेन है और चढ़ाई भी कम है पर लम्बाई अधिक है | मैं ठहरा पहाड़ी बन्दा खड़ी चढाई चढ़ जाऊंगा लेकिन लम्बे रस्ते से नहीं जाऊंगा | जहाँ ये दोनों रस्ते मिलते हैं वहीँ कुछ दुकाने हैं और वहीँ पहुँच कर मुझे पानी नसीब हुआ | अतः आपसे बिनती है की मोरनी की तरफ आने से पहले 4-5 लीटर पानी ले के चलें |
मोरनी अब बस 9 km ही दूर था और चढाई भी इतनी तीखी नहीं रह गई थी | चील के पेड़ और वातावरण में बदलाव महसूस हो रहा था | मोरनी पहुँचने पर पहला ख्याल तो यहीं से लौट जाने का आया | जितनी चढ़ाई 4:30 घंटे में चड़ी थी उतरने में तो शायद 1:30 ही लगता | लेकिन अभी स्टैमिना बाकि था तो टिक्कर ताल जाने का निर्णय लिया |
मोरनी हिल्स
टिक्कर ताल
टिक्कर ताल मोरनी से 8 km दूर है और मोरनी से यहाँ तक सीधी उतराई ही है | हवा में उड़ता हुआ मैं टिक्कर ताल पहुंचा और सीधा ताल के पास जाकर ब्रेक लगाई |
3:30 pm पे यात्रा का आधा अध्याय पूरा हुआ | कुछ देर रेस्ट और फोटो खींच लेने के बाद जब सर उठा कर मोरनी की तरफ देखा तो सारा जोश ऐसे उतर गया जैसे गुब्बारे में से हवा | जिस 8 km की उतराई को बड़े मज़े से उतर आया अब उसे चढ़ने की बारी थी |
इस यात्रा का अगला भाग यहाँ पढ़ें
Wednesday, 25 May 2016
इंदपुर (इंदौरा) टू बाथू की लड़ी (ज्वाली)
कुछ रास्ते आपके जीवन में खास महत्व रखते हैं | खास कर वो जो आपके घर की तरफ जाते हैं | खैर छोडिए जयदा भावुक बातें न करते हुए अब यात्रा पे आता हूँ |
पेपर ख़त्म होते ही मैं घर चला गया | मेरा घर जो की अब गाँव इंदपुर तहसील इंदौरा, काँगड़ा जिला हिमाचल प्रदेश में पड़ता है जो कभी गांव करडियाल तहसील ज्वाली जिला काँगड़ा में बसा करता था | दोनों स्थानों के बीच की दुरी तो लगभग 50 km है लेकिन संकरा खस्ताहाल पहाड़ी रास्ता तय करने में गाड़ी में भी 1:30 घंटा लग जाता है |
वैसे ज्वाली जाने का कोई निश्चित प्लान नहीं था | 17 मई की शाम मैं घर पहुंचा | 18 की सुबह 9 बजे तक माता जी और पिता जी स्कूल के लिए निकल गए और मैँ नाश्ता करने बैठ गया | खाना खाते खाते अचानक ही दिमाग में आया की साइकिल पे इतना घूम लिया पर अपने घर नहीं गया फिर इतना घूमने फिरने का फायदा क्या ?
जल्दी जल्दी खाना खाया और साइकिल निकाल ली | एक पानी की बोतल लेकर करीब 9:30 घर से निकल पड़ा |
मई के महीने की तेज धूप और उसमें साइकिल चलाने का जज़्बा रख मैँ घर से चल तो पड़ा लेकिन थोड़ी ही दूर जाने के बाद तीखी चढाई शुरू हो गई | इंदपुर से सहौड़ा तक तो 4 km की खड़ी चढाई है, जोश जोश में वह तो चढ़ गया लेकिन सहौड़ा से 3 km आगे झंगराडा गाँव तक की चढाई चढ़ना तो टेडी खीर ही साबित हुआ | 1 घंटे में किसी तरह बिना रुके 7 km की चढाई पूरी हुई | इंदपुर और झंगराडा के बीच में कई जगह चढाई इतनी तीखी है कि साइकिल का अगला टायर तक उठ जाता है |
झंगराडा पहुँचने के बाद वहां रेस्ट की और पानी पिया | झंगराडा से दो रास्ते कट जाते हैं, एक जसूर की ओर दूसरा रेहन की ओर | मैँ रेहन कि ओर चल पड़ा | रास्ता तो अब और भी संकरा और खस्ताहाल हो गया था |
बीच बीच मैं जब कभी बस या ट्रक को क्रॉस करना पड़ता तो साइकिल रोक कर साइड में खड़ा होना पड़ता था | खैर चढाई और उतराई दोनों ही थीं तो चढाई चढ़ते समय की थकान उतरते समय दूर हो जाती |
झंगराडा से रेहन रोड पर आप वनस्पति को बदलते देख सकते हैं | शुरुआत में मैदानी इलाकों के पेड़ पौधे हैं और बीच में चीड़ जैसे पहाड़ी पेड़ भी दिखाई दे जाते हैं | कई जगह सीडी नुमा खेत भी दिखाई देते हैं | दूर से दिखते पहाड़ों के नज़ारे मन मोह लेते हैं |

1 घंटे बाद मैं रेहन पहुंचा | वहां से भरमाड़ की तरफ चल पड़ा | रेहन से भरमाड़ के बीच में शिबोथान मंदिर आता है | यहाँ हर साल मेला लगता है, बच्च्पन्न में गर्मियों की छुट्टियों में बुआ जी के साथ तो बहुत आना जाना हुआ करता था यहाँ | बाहर से ही माथा टेक अपने रास्ते पे चलता रहा |

भरमाड़ पहुँच कर ज्वाली रोड पकड़ ली |
इस रास्ते पे चलते चलते बहुत सी पुरानी यादें ताज़ा हो उठीं | जब हमारा घर बन रहा था तब बजाज चेतक के आगे खड़े होकर पिता जी के साथ ज्वाली इंदौरा रूट पर आना जाना लगा रहता था और बुआ जी के घर (गाँव पट्टा जट्टिआं) से तो खेतों के बीच में से शॉर्टकट से शिबोथान पैदल ही आया जाया करते थे |
कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जिनको याद करने से थकान, प्यास स्वतः ही मिट जाती है | भरमाड़ से मैरा पुल पर पहुंचा |मैरा पुल बूल नाम की खड् पे बना है जो की व्यास की सहायक नदी है |

मैरा पुल से सामने पहाड़ों का दर्शन करके आगे बढ़ गया | थोड़ी आगे जाने के बाद ज्वाली रोड से राइट टर्न करके मतलाड की ओर हो लिया | बच्च्पन में कई बार घर से नाराज होकर या मस्ती में मैं छोटी साइकिल लेके मतलाड की ओर आ जाया करता था और मेरी माता जी मेरे पीछे पीछे |
पुरानी कच्ची सड़कों की जगह कंक्रीट बिछ गई है और कच्ची गलियों के साथ मेरे क़दमों के निशाँ भी मिट चुके हैं, चलो डेवलपमेंट तो हुई है |

करडियाल पहुँच कर लगा की अभी शरीर में और ऊर्जा बाकि है | घर की तरफ न जाकर मैं फारियां से पपानी की ओर चल पड़ा | मंज़िल थी बाथू की लड़ी |

बाथू की लड़ी इतिहास के उन मंदिरों में से है जिनके बारे में सही से कोई नहीं जानता | पौंग डैम में जब जलस्तर बढ़ जाता है तो यह मंदिर जलमगन हो जाते हैं | अधिक जानकारी के लिए गुरु जी का लिंक देखें |
वैसे बाथू की लड़ी तक जाने का उदेश्य केवल मंदिर देखना ही नहीं था | पौंग डैम बनने से पहले यहाँ से करीब 10 km आगे दरोका नाम का स्थान हुआ करता था जहाँ किसी समय मेरे पुरखे रहा करते थे | सरकार ने उपजाऊ जमीन लेकर राजस्थान में रेत के टीले तो दिए मगर अपने स्थान से विस्थापित होने का दर्द तो कभी दूर नहीं हो सकता | खैर अब तो पानी ही पानी है और बहुतों के रेत के टीले आज भी बाबुओं की फाइलों में इंदिरा गांधी नहर का पानी पी रहे हैं |
पपानी से फ्लड एरिया शुरू हो जाता है और यहाँ से बाथू की लड़ी करीब 5 km दूर है | कच्चा रास्ता और भूमि पर निर्जलीकरण के कारण पड़ी बड़ी गहरी दरारें पपड़ी सी सतह का सा एहसास दिलातीं हैं | धूप की ताकत तो सुखी जमीन से मिल कर मुझे निढाल किये जा रही थी | खैर आखिरकार में अपनी मंज़िल पर पहुँच ही गया | मंदिर को देख कर ऐसा प्रतीत होता है मानो इतिहास आज भी हमारे वर्त्तमान में सीना ताने खड़ा है |

भरी दोपहर में मंदिर में कोई नहीं था | कुछ देर आतीत के आगोश में सुस्ता लेने के बाद फोटो वगैरा खींच कर घर चला गया |


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