Wednesday, 4 January 2017

चंडीगढ़ से वाघा बॉर्डर भाग 1


कुदरत-ए-हस्ती
हक़ गिरेबान की खोज में
आज चला हूँ
अपने आप की खोज में
मंज़िल क्या है मेरी
क्या मेरा वज़ूद है
इस धरती में मेरा क्या
काम मौज़ूद है
कहाँ वो बाग़-ए-बहिश्त
कहाँ असल दर-ए-रसूल है 
मंज़िल क्या है मेरी
क्या मेरा वज़ूद है

आज चला हूँ
सब दरकिनार कर
बंद कर उधेड़ बुन
बस अपने असल मन  की सुन
जो राह-ए-दर-ए-असल है
राह वो चुन
जो है मौज़ूद हर मंज़िल-ए-राह में
उसी के हुक्म की आहट सुन
जो रहनुमा है सबका
उसका कहना सुन
आज तो उसकी
राह ली है चुन

आज चला हूँ
तेरे भरोसे पर
मंज़िल दूर है
मेहनत भरपूर है
तेरे दर पर तो बस
मेहनत का नूर है
कर बख़्श मुझे तू
मेहनत का रास्ता
आज तो तुझे
तेरी रहनुमाई का वास्ता
है मुश्किल ये राह
तो मुश्किल ही सही
इलावा इसके कोई रज़ा ही नहीं

ऐ रहनुमा तू मुझे हर शह परख
वो अज़मत-ऐ-मेहनत
मेरी नज़र कर
जो बहता मेरी रगों में
उस लहू को अबशार कर
मेरी नज़र-ऐ-अजनबी को
तू पाक-साफ कर
कर दे तू मुश्किल
मेरी मुश्किल को और भी
आज़माने चला हूँ अपनी
मज़बूती-ऐ-ज़ोर भी
मेरे दम को तू
और मज़बूत कर
मेरे रहनुमा
तू मुझे मेहनत अता कर

चला हूँ आज
चंडीगढ़ से वाघा की राह पर
दोपहर 1 बजे निकला
मंज़िल की राह पर
आज का मुकाम
100 km दूर है
इस सर्द दोपहर में
बिखरा रहनुमा का नूर है

चण्डीगढ़ से चला गढ़शंकर की ओर
पकड़ वही पामाल रास्ता 
वही पुरानी ठौर 
साइकिल भी चलती मानो अकड़
चलाओ जितनी भी तेज़ 
ज़ोर लगाओ बेधड़क

                                             ये 
खेत-खलियानों के नज़ारे 
तो देखो 
गुड़-शक्कर की ये दुकाने 
तो देखो
देखो की कैसे देश तरक्की करता है 
गाड़ी का टोल कैसे कटता है 


टोल से आगे फिर शहर कुराली आता   
गुड़, मूंगफली, गन्ना और सूरजमुखी 
के लिए जाना जाता   


कुराली से मुड़ा फिर मैं रोपड़ की ओर
सिंधुघाटी सभ्यता की ये पुरानी ठौर 
बसा सतलुज किनारे
ये शहर ऐतिहासिक
शिवालिक के पैरों की दलदल
जो है संरक्षित 
सड़क किनारे दिख जाते हैं यहाँ मोर 
रोपड़ से चला मैं बलाचौर की ओर 
सतलुज के उस पार
ब्यास के इस पार
पड़ता है बिस्त दोआब   


बलाचौर में बंद इक टोल है आता 
अक्सर रुक जाता है 
यहाँ से मुसाफिर आता-जाता 
पीता हूँ गन्ने का रस और लंगर हूँ छकता
और गुणगान उस रहनुमा का करता 
जो सबके लिए सब इंतज़ाम करता 
समझो तो सही उसके इशारे 
वही खोलेगा छुपे भेद सारे 



बलाचौर से गढ़शंकर की ओर चला
देखते ही देखते दिन भी ढला
अब मुसाफिर आज के पड़ाव की ओर चला 
पड़ाव तो है ये सीधे रस्ते से थोड़ा हट के 
लेकिन विश्राम भी तो करना है 
कब तक सड़कों पे यूँ भटकें
आज रुकूँगा अपने मित्र के पास 
है तो भाई बड़ा ही खास
तभी आ गया सीधा रास्ता छोड़ 
उसके पास 


इक्कट्ठे लूटे थे किसी समय 
वो चण्डीगढ़ के नज़ारे
आते हैं सामने अब वो 
बीते लम्हे सारे 
वो रातों को आखिरी शो की फिल्में 
वो सारी
कभी तो पैदल कभी ऑटो की सवारी 
वो पीजी वाली ऑन्टी के नख़रे वो सारे 
पकड़ो मनदीप को मेरे पैसे उसने हैं मारे 
वो यादें पुरानी सारी
जो आँखों के सामने चलीं 
खोया हुआ मैं उनमें
चेहरे पर मुस्कराहट खिली 
वक़्त की तेज़ मझधार में
ये किस्से पुराने पुल से 
धुंधली होती यादें 
किस्से ये ऊषा से
ज़िन्दगी ग़र है तो 
कुछ खट्टे-मीठे किस्से 
सीख लो कुछ 
बस तुम इनसे 

सोच-सोच में डूबा
पहुँचा मैं मनदीप के घर पे 
100 km चलने में
लगे 4:30 घण्टे
और वो यार फिर दिलदार सा मिला 
फिर पुरानी यादों का सिलसिला चला 
चाय के दौर के बाद
खाना दिया खिला 
फिर तो मैं घोड़े बेच कर सो ही गया 


कल पहुंचूंगा वाघा
जो अभी 180 km दूर है
मेरे रहनुमा 
कितना हसीं तेरी कायनात का नूर है 
बस बना रहना मेरा हमसफ़र 
हम फिर रहे सब हैं भटके
सही राह तू दिखा   
हमसफ़र तू सबका 
सही राह तू दिखा   

  







5 comments:

  1. Bahut achhi jankari haan ek jankari aur tata ki cycle na le bahut problum karti hai bina gear ki bhi abhi li hai 01/07/2018 ko

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