Monday, 9 January 2017

जलियाँवाला बाग़ अमृतसर (चण्डीगढ़-वाघा-चण्डीगढ़ साइकिल यात्रा भाग-4)



एक ही नाम लिखा है
शहीद-ऐ-आज़म
राम मोहम्मद सिंह आज़ाद का
जिसका जिगरा था फौलाद का
गोली लगी हर ईंट पर
हर ज़र्रे पर
जलियांवाले बाग़ के

किताबों का झूठ
आज मेरे एहसास ने
नामंज़ूर कर दिया
सच जो देखा
जालियांवाले बाग़ का
जो एकता अंग्रेज़ों से
देखी न गई
फिर सहारा लेकर धर्म का
फूट हर सिम्त डाली गई
लिया बदला जिसने
इस क्रूर अत्याचार का 
एक ही नाम गूँज रहा ज़ेहन में
शहीद-ऐ-आज़म
राम मोहम्मद सिंह आज़ाद का
जिसका जिगरा था फौलाद का

21 साल का सब्र
किया अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने को
देखो कितना धीरज धरा
लक्ष्य प्राप्त करने को

वो डायर जो कायर निकला
कर रहा तौहीन उसकी
शब्द हर मेरी बात का
आज चमक रहा
जो सूरज आज़ादी का
जो देखा हम सबने
संघर्ष भूला लेकिन
हर देशप्रेमी ज़ात का
वो आज़ादी के दीवाने
भी क्या खूब मतवाले थे
सूली चढ़े हंस कर सब
आज क्यों भूले हम उनको
और अर्थ
उनकी हर बात का


ऐ अंग्रेज़ो
बैसाखी के दिन
जो तुमने
कत्लेआम था किया
हैवानियत की हदों को
जो तुमने पार था किया
चलायी गोली तुमने निहत्थे लोगों पे
न जाने कितनी बार तुमने
इंसानियत को शर्मसार था किया

वो जन्मा नहीं कोख़ से
उसी बाग़ में था पैदा हुआ
जिस समय तुमने ये
हत्याकाण्ड था किया
तप उसने
21 साल तक था किया
फिर वर उसे मिला वो
जिससे राक्षस डायर का
संहार उसने था किया



की खड़ा हूँ आज
मैं उसी कौमी एकता की दीवार के सामने
छल्ली जिसका सीना
अंग्रेज़ी सरकार ने था किया
पर
सर ऊँचा है मेरा
की
जियो शहीद-ऐ-आज़म उधम सिंह
की तुमने काम ऐसा किया
हर भारतीय का सिर
ऊँचा उठा दिया
ग़र मिलती आज़ादी
और डायर जिन्दा रहता
कैसे मैं बात अपनी यह
फिर इतने फ़क्र से कहता
की तुमने हमारे कंधे से
तोहमत का भार उतार दिया
जिओ शहीद-ऐ-आज़म उधम सिंह
की तुमने काम ऐसा किया
देश का
गुलाम आत्मसम्मान जगा दिया
अपाहिज़ जो ज़ेहन था उसको
सशक्त बना दिया
जिओ शहीद-ऐ-आज़म उधम सिंह
की तुमने काम ऐसा किया
हर भारतीय का सिर
ऊँचा उठा दिया

क्या एक भी निशाँ मिला ?
गोली का
किसी की भी पीठ पर
तुमने गोली चलाई चुपके से
पर सामना छाती ने ही किया
तुम्हारी हर चाल का
और तुम कहते हो की गोरे पवित्र हैं
हर हिंदुस्तानी आज भी
गवाह तुम्हारे हर विश्वासघात का
समझ लेना ना नफ़रत का पुजारी
तुम मुझे
हर हिंदुस्तानी
दीवाना है इंसानियत ज़ात का
तभी ज़िंदा बच निकले तुम
सही सलामत बीवी बच्चों समेत
करुणा बस्ती यहाँ
दिल ये पाक-साफ़ इंसान का
द्वेष मेरे दिल में कोई
ये मत समझना
बदला ले रही कलम
उसी 200 साल का

की इंसानियत का मैं पुजारी
मेरा देश पुजारी
पर सवाल कर रही हर रूह वो
निवाला छीन कर खाया
जिस मज़बूर हर इंसान का
मैं नहीं जानता की
ख़ज़ाने कितने
तुम्हारे भर गए
चोंच से तिनका तक लूटा
चिड़िया-ए-हिन्दोस्तान का
और जो कुआँ था
बेकसूर लाशों से भर गया
उसका पानी आज भी
मीठा ही होगा
यह हर शब्द कहता
आज मेरी बात का
खून जो लावा बन
आज रागों में मेरी बह रहा
एहसानमंद हूँ उस
देशप्रेमी ज़ात का

मेरे रहनुमा मुझे इंसानियत
की हदों में रख
कोई धर्म का सौदागर
गलत मतलब ना निकल दे
मेरी किसी बात का




6 comments:

  1. Nice concept!
    History through the eyes of poetry and pics!
    Good blend indeed!

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  2. बहुत बढ़िया सौरभ जी

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  3. मज़ा ही आ गया इस काव्य् को पढ़कर

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