Tuesday, 29 March 2016

पटियाला टू चंडीगढ़ रिटर्न यात्रा

चंडीगढ़ से पटियाला पहुंचना तो फिर आसान था मुश्किल था तो वापिस चंडीगढ़ जाना | अगले ही दिन रविवार 27 मार्च को वापिस जाना मज़बूरी थी क्योंकि सोमवार से कॉलेज शुरू था | रविवार को सुबह 10  बजे उठा और करीब 2:30  बजे तक वापिस जाने की हिम्मत जुटा पाया | भरी दोपहर में चलना शुरू किया | सबसे पहले तो एक साइकिल वाले के पास रुक के साइकिल के टायर की एलाइनमेंट ठीक करवाई | उस समय तो मेरे दिमाग में बस यही चल रहा था की 6  बजे तक पहुँच जाऊंगा तो इंडिया ऑस्ट्रेलिया का मैच देख लूंगा | 


पटियाला से सिरहिंद रोड़ पकड़ ली | सूर्यदेव प्रचण्ड थे और मैँ भी जोश से भरा हुआ | पटियाला से सिरहिंद लगभग 30 KM है  और यह दूरी मैंने कब तय कर ली पता ही नहीं चला | सिरहिंद पहुँच कर थोड़ी देर रेस्ट की | विश्राम करने के बाद फतेहगढ़ साहिब की ओर हो लिया  | मैँ फिर से SH  12A  पे पहुँच चुका था |
इंडिया ऑस्ट्रेलिया का मैच होने के कारण ट्रैफिक जबरदस्त था | बम्पर टू बम्पर गाड़ियां अक्सर रुक रुक के चल रहीं थीं | इस ट्रैफिक में साइकिल के लिए कोई जगह नहीं थी | साइकिल सवार तो जैसे सड़क के समाज का हरिजन है  |
 सुरक्षा के लिए मैंने साइकिल साइड में बने कच्चे रास्ते पे ही चलाना सही समझा | कच्चे रास्ते पर चलते हुए मैं ट्रैफिक में फसी गाड़ियों से आगे निकल आया था | जाम की शुरुआत में पहुंचा तो पता चला 7-8  गाड़ियां एक दूसरे में जा टकराईं थीं और उनके मालिक झगड़ रहे थे जैसे सुनील शेट्टी अदालत में अपनी बेगुनाही का सबूत पेश कर रहा हो |
थोड़ी दूर चलने के बाद एक जूस वाले के पास रुका और हमेशा की तरह एक जग आर्डर कर दिया | जूस पीने के बाद फिर से धुप से लड़ने के लिए मैं तैयार था | झंजेहडी पहुँचने तक फिर से जाम लग गया था | 
भारतीय क्रिकेट टीम की जर्सी पहने बहुत से खेल प्रेमी कार से मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मैंने विराट कोहली का अपहरण कर लिया हो | पता नहीं लोग गाड़ी में बैठते ही अपना फ़र्ज़ क्यों भूल जाते हैं, चिप्स के खाली पैकेट्स, खाली बोतलें सड़क पे ऐसे फेंकते हैं जैसे विकेट्स पे थ्रो मार रहे हों |
लांडरां पहुँच कर मैं चंडीगढ़ की ओर चल पड़ा और ट्रैफिक मोहाली स्टेडियम की तरफ | 
लगभग 5:30 बजे चंडीगढ़ सेक्टर 43 पहुंचा | 2 पैकेट दूध पी कर यात्रा समाप्त की गई |   

    



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Monday, 28 March 2016

चंडीगढ़ से पटियाला यात्रा

मार्च माह के आखिरी हफ्ते में होली की छुट्टियां हुई | मैं घर नहीं गया और कॉलेज में ही धूमधाम से होली मनाने के बाद बाकि बची छुट्टिओं में बारी साइकिल की सवारी की थी | बाकि साथी घर गए थे तो किसी रिश्तेदार के यहाँ ही जाना ठीक समझा | सोच विचार कर लेने के बाद पटियाला का टारगेट फिक्स किया गया |
25 को सुबह लगभग 10 बजे चंडीगढ़ से पटियाला की ओर चल पडा | वैसे चंडीगढ़ से पटियाला जाने के लिए NH 1 ही सही रास्ता है लेकिन कंस्ट्रक्शन के चलते  फोर की जगह टू लेन ही चालू है और उस पर हाईवे पर सम्पूर्ण ट्रैफिक को मद्देनज़र रखते हुए मैंने पामाल SH 12 A  से जाना ही ठीक समझा | फतेहगढ़ साहिब की यात्रा भी इसी रस्ते से की थी तो कंडीशन्स का अंदाजा था | वैसे ट्रैफिक का हाल वही था जो पहले था |

चंडीगढ़ से लांडरां और वहां से चूनी कलां पहुंचा | निकले हुए एक घंटा ही हुआ था लेकिन धूप ने तो जैसे जला ही डाला था | सड़क पर मृग मरीचिका ( mirage) का नज़ारा कुछ ऐसा था की मानो थोड़ी दुरी पर समुन्दर है जो की थके तपते तन को शीतल करने को आतुर है लेकिन मैं उसके जितने पास जाता वो उतना ही और आगे खिसक जाता |

सांसे समेटता हुआ मैं फतेहगढ़ पहुंचा लेकिन वहां रुका नहीं सिरहिंद की ओर चल पडा | जानता था कि सिरहिंद ज़्यदा दूर नहीं है और वहां से पटियाला एक घंटे में पहुँच जाऊंगा | सिरहिंद पहुँच कर पानी पिया और थोड़ी देर रेस्ट की |

सिरहिंद से पटियाला की ओर चलना शुरू ही किया था की सेकेंड हैंड हीरो हॉक ने जवाब दे दिया | शायद एक्साइटमेंट में मैंने इतना जोर लगा दिया था की टायर एक ओर खिसक गया और जाम हो गया था | मैंने अपनी 4 साल की मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री को ताक पे रखते हुए रस्ते में पड़े हुए एक पत्थर को उठाया और रियर एक्सेल पे सही जगह दे मारा और सब सेट हो गया | वैसे हमेशा मैं 14 -15 का पाना लेके चलता हूँ लेकिन इस बार वजन कम रखने के चक्कर में छोड़ आया था |  सबक मिल चुका था |

लगभग एक बज चुका था | सूर्य देवता एक दम प्रचण्ड रूप धारण किये हुए मुझे गन्ने की तरह निचोड़े जा रहे थे | पटियाला बस 15 km ही था लेकिन यह दूरी तय करना मुश्किल होता जा रहा था | जैसे तैसे करके मैं 1 :30 बजे के करीब मंज़िल पे पहुँच गया |  

         

  

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Wednesday, 2 March 2016

चंडीगढ़ से फतेहगढ़ साहिब और संघोल यात्रा

फ़रबरी का महीना व्यस्तता में ही बीत जाने वाला था | आखिरी हफ्ते में गुरु जी के द्वारा फतेहगढ़ साहिब  जाने की इच्छा जाहिर की गई | शुभम जी ने पहले थोड़ी टालमटोल की लेकिन बाद में वह भी रेडी हो गए | यात्रा के लिए शुक्रवार 26 फरबरी का दिन तय किया गया |
शुभम जी थोड़े ब्यूटी कॉन्शियस हैं | मौसम भी गर्म हो चूका था | धूप से बचने के लिए उन्होंने चेहरे पर मुल्तानी मिटी का लेप लगा लिया और मैंने और गुरु जी ने भी उनके इस स्टाइल को फॉलो कर लिया|

चंडीगढ़ से हम लगभग दोपहर के 2 बजे चले | चंडीगढ़ से ही ट्रैफिक ने परेशान करना शुरू कर दिया था | चंडीगढ़ से बाहर निकल कर सरहिंद रोड़ (SH 12A ) पकड़ ली | सरहिंद रोड़ तो गाड़ियों से ओवरलोडेड चल रहा था | लांड्रा से थोड़ा आगे जाने पे कम से कम सड़क पर पार्क की हुई गाड़ियों से तो पीछा छूटा लेकिन सामने से तेज रफ़्तार  रोंग साइड पे ओवरटेक पे उतारू ट्रैफिक ने पूरे रास्ते खौफ फैलाये रखा | झंझेहड़ी से थोड़ा आगे जा के ब्रेक लिया गया | फोटो वगेरा खींचने के बाद फिर से चलने लगे और कुछ दूर जाने के बाद एहसास हुआ की मैं अपनी बोतल वहीँ भूल आया हूँ | वापिस जाने का मूड नहीं हुआ वैसे भी बोतल ख़ाली थी और उसमे रखा नीम्बुपानी हम पी चुके थे | मैंने थोड़ी स्पीड पकड़ ली और सबसे आगे चलने लगा | चुनी कलां के पास पंक्चर टायर को चेंज करने में लगी पंजाब पुलिस की तीन मुलाजिम दिखीं | सिचुएशन देख कर मैं भी रुक गया और टायर बदलने की पेशकश की और हेड कांस्टेबल साहिबा ने पाना मेरे हाथ में थमा दिया | थोड़ी ही देर में टायर चेंज कर दिया गया और तब तक शुभम जी भी मेरी मदद के लिए आ चुके थे | शायद साइकिल का यह फायदा भी है और नुकसान भी की आप अपने आस पास की दुनिया को इग्नोर किये बिना नहीं चल सकते जैसे की गाड़ी के विंडो क्लोज और म्यूजिक ओन करके किया जा सकता है |


भैरोपुर से हम फतेहगढ़ साहिब की और हो लिए और ट्रैफिक सरहिंद की तरफ | थोड़ी ही दुरी पे बाबा बंदा सिंह बहादुर की यादगार में बने गेट ने फतेहगढ़ साहिब की दुनिया की सबसे महंगी ज़मीन पर हमारा स्वागत किया |
गुरूद्वारे पहुँच कर सबसे पहले तो सरोवर में डुबकी लगाई जहाँ शुभम जी अपना चश्मा प्रवाहित कर आये | फिर सराय में कमरा लेने के बाद साइकिल पार्किंग में लगा दिए गए |गुरूद्वारे में माथा टेकने, गुरुद्वारों की हिस्ट्री सुनने और सरहिंद की वो दीवार देखने के बाद फतेहगढ़ साहिब के ऐतिहासिक महत्त्व का पता चला  | 
लंगर खाने के बाद हम करीब 8:30 बजे सो गए | करीब दस बजे आवाज हुई तो आँख खुल गई और पता चला की गुरु जी की तबीयत बिगड़ चुकी थी | सारी रात गुरु जी ने खांसते खांसते निकली |


सुबह करीब 9 बजे हम संघोल के लिए निकले | संघोल में पुरातन विभाग का म्यूज़ियम देखा तो पता चला कि संघोल में बुध स्तूप मिला है जो कि 2100 साल पुराना है | फिर स्तूप की साइट पर पहुंचे तो वहां तेजा सिंह जी से मुलाकात हुई | तेजा सिंह जी ने 1985 में वहां दबी एक सोने की माला ढूंढ निकली थी और इनाम स्वरूप उन्हें पंजाब सरकार से कम्बल भी मिला था | संघोल में ऐसी दो साइट हैं और अब दोनों भारतीय पुरातन विभाग के अधीन हैं |

एक ढाबे में परांठे खाने के बाद चंडीगढ़ जाने वाला रास्ता पकड़ लिया | नॉन स्टॉप चलते हुए लगभग 2 बजे चंडीगढ़ पहुँच गए |
 

CHANDIGARH TO FATEHGARH SAHIB

  
FATEHGARH SAHIB TO SANGHOL AND FROM SANGHOL TO CHANDIGARH


Thursday, 28 January 2016

आनंदपुर साहिब टू चंडीगढ़ रिटर्न यात्रा

चंडीगढ़ से आनंदपुर साहिब पहुँचने की सारी थकान रात भर में उतर चुकि थी | सुबह नाश्ता करके करीब 10 बजे सराय से निकल पड़े | पार्किंग से साइकिल की सवारी शुरू की गई | पास ही विरासत--खालसा देखने गए |



विरासत खालसा एक hitech मॉडर्न म्यूजियम है | यहाँ सिख इतिहास को बहुत ही डिजिटल तरीके से एक्सप्लेन किया गया है | कला और टेक्नोलॉजी का बेजोड़ मास्टरपीस है | अब तो शायद सांस्कृतिक विरासत को बचाने का यही तरीका रह गया है |
विरासत खालसा देखने के बाद रिटर्न जरनी प्लान की गई | शुभम जी और गुरु जी दोनों ने बस में वापिस जाने का प्लान बनाया लेकिन मैं कहाँ साइकिल छोड़ के बस में बैठने वाला था | गुरूजी ने अपनी 26000 की साइकिल ऑफर की लेकिन मैं अपनी ग्रेट इंडियन रोड बाइक हीरो हॉक को कहाँ छोड़ने वाला था  | दोनों से विदा लेकर मैं करीब 11:30 बजे अकेला ही चंडीगढ़ की तरफ निकल पड़ा |
आनंदपुर से किरतपुर तो आराम से पहुँच गया | कीरतपुर से भरतगढ़ की तरफ चढाई है वहां गियर वाली साइकिल की याद तो बहुत आई मगर जैसे तैसे बिना रुके चढाई चढ़ गया |

रोपड़ से करीब 5 Km पहले बस में से शुभम जी मुझे बाय करके चले गए | आनंदपुर से नॉन स्टॉप चलता हुआ रोपड़ पहुंचा | वहां पानी पीने के बाद कुराली पहुंचा | इस बार कुराली फ्लाईओवर के नीचे से जाने की सोचीनीचे ट्रैफिक बिलकुल भी नहीं था | थोड़ी दूर जाने के बाद कारण भी साफ़  हो गयानीचे रेलवे लाइन है जहाँ कभी फाटक होता था लेकिन शायद फ्लाईओवर बनने के बाद रेलवे वालों ने फाटक परमानेंटली ही बंद कर दिया | पैदल चलने वालों के लिए निकलने का रास्ता है वहीँ से साइकिल उठा के दूसरी और पहुंचा दी और फिर से चंडीगढ़ की ओर चल पड़ा |

कुराली से चंडीगढ़ की तरफ नरम चढाई है | जोश से भरा हुआ मैं साइकिल भगाता हुआ चला जा रहा था |
मुल्लांपुर के करीब गुरूजी का फ़ोन आया और कहा की हम पहुँच गए हैं और मैंने कहा की 30 मिनट मे मैं भी पहुँच रहा हूँ | करीब 3:30 बजे मैं भी अपने हॉस्टल पहुँच गया |

  
आनंदपुर से चलते समय मैंने यात्रा के लिए 4 घंटे का टारगेट सेट किया था और जब हॉस्टल पहुँच के मैप चेक किया तो यात्रा बिलकुल एस्टिमेटेड टाइम में पूरी की थी | जब आप अपनी उमीदों पे खरे उतर जाओ तो जो सुकून मिलता है, उसका स्वाद ही अलग है |

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चंडीगड़ से आनंदपुर साहिब की यात्रा का विवरण

चंडीगढ़ से घर तक की 250 किलोमीटर की यात्रा के बाद मैं अपनी साइकिल घर छोड़ वापिस चंडीगढ़ गया, लेकिन साइकिलिंग का कीड़ा तो जाग चुका था | वापिस के एक सेकिण्ड हैंड हीरो हॉक खरीद ली | मेरी घर तक की यात्रा का किस्सा हॉस्टल में ब्रेकिंग न्यूज़ बन चुका थासाइकिल का क्रेज अब मेरे तक ही सीमित था, मेरे करीबी दोस्त शुभम जी ने भी साइकिल खरीद ली |
 आनंदपुर साहिब जाने का प्रोग्राम तो हफ्ता पहले से ही बन गया था, लेकिन इंतज़ार तो बस गुरु जी के आने का | गुरु जी का ज़िक्र हुआ है तो उनके बारे में जितना बोला जाए कम ही होगा | ट्रैकिंग के उस्ताद और जिवंत शख्सियत ,हिमाचल का तो शायद ही कोई पहाड़ होगा जो उन्हें जानता होगा | गुरु जी की वेबसाइट पर उनके कारनामे देखे जा सकते हैं :  (tarungoel.in)|

गुरु जी के आने बाद प्रोग्राम पक्का किया गया और 22 जनवरी दिन शुक्रवार की दोपहर करीब 1:30 बजे यात्रा शुरू की गई |
सेक्टर 12 से मध्यमार्ग पर चलते हुए न्यू चंडीगढ़ वाली रोड़ से कुराली चंडीगढ़ रोड़ पर पहुंचे | कुराली रोड़ पर गुड़ बनाने वाली फैक्ट्री से आधा किलो गरमा गर्म  गुड़ खरीदा और वहां काम करने वाले लोगों से बातचीत की |



गुड़ फैक्ट्री कुराली रोड 

कुराली पहुंचना आसान था क्यूंकि चंडीगढ़ से कुराली की तरफ ढलान है | अभी तक यात्रा एक दम स्मूथ चल रही थी लेकिन कुराली फ्लाईओवर पार करना तो बहुत मुश्किल काम था | पहले तो ट्रैफिक के साथ फ्लाईओवर के रोड़ पे चढ़ गए लेकिन जब ट्रक और बसें थपकी देकर साइड लाइन करके जाने लगीं तो जान बचने के लिए साइकिल उठा के साइड में बने पेडेस्ट्रियन पाथ पे चलाने लगे | जब फ्लाईओवर ख़त्म हुआ तो एक जोरदार जम्प के साथ फ्लाईओवर के पेडेस्ट्रियन पाथ से सड़क पर गए | कुराली से रोपड़ करीब 3:30 बजे पहुंचे और रोपड़ से किरतपुर की तरफ हो लिए |

शुभम जी की तो यह पहली यात्रा थी और नई साइकिल थोड़ी भारी भी चल रही थी बेचारे बड़ी होशियारी से अपनी थकान छुपा रहे थे | मलिकपुर  पहुँच कर हमने साइकिल एक्सचेंज कर ली | मलिकपुर से कुछ दूर आगे नहर के ऊपर से फ्लाईओवर है | फ्लाईओवर के ऊपर से जाकर मैंने साइकिल नीचे से निकालने की सोची और फ्लाईओवर से नीचे वाली रोड़ पे चल पड़ा | आगे जा के रोड़ किसी गाँव की तरफ मुड़ गया और तब मुझे एहसास हुआ की शॉर्टकट तो लॉन्ग कट बन गया है | फिर U टर्न लेकर वापिस सही रोड़ पे आया और इस सब के बीच साइकिल की घंटी कहीं गिर चुकी थी |

घनौली से थोड़ा आगे जा के एक जूस वाले के पास डेरा जमाया गया | साइकिल का जायज़ा लिया गया | जूस पिने के बाद थकान मिट चुकि थी | ह सभी अपनी अपनी साइकिल पे सवार हो गए और यात्रा फिर से रिज्यूम की गई | अँधेरा होने लगा था |

भरतगढ़ से करीब 3 किलोमीटर पहले उतराई उतरते समय यात्रा की टॉप स्पीड 51 KM/Hr हासिल की गई | टॉपस्पीड के चक्कर में मैं काफी आगे गया था और पसीने से मेरे कपडे भी भीग चुके थे | मैंने सोचा कहीं रुक के आग जलायी जाए और इसी बहाने नए मैग्नीशियम फ्लिंट की भी टेस्टिंग की जाए | साइकिल सड़क के किनारे लगा के घासफूस इकठ्ठा की | आग जला के जैकेट सुखाई गई और गुड खाया गया | थोड़ी देर आग सेकने और इंतजार करने के बाद गुरु जी और शुभम जी भी गए |
किरतपुर पहुँच कर शुभम जी ने रात वहीँ बिताने का इरादा जताया लेकिन गुरु जी और मैंने बड़ी मुश्किल से उनको समझा-भुजा के आज ही यात्रा ख़त्म करने के लिए राजी किया | एक बार फिर से साइकिल बदल लिए गए | अँधेरा हो चुका था और शुभम जी की साइकिल लाइटों से चमचमा रही थी |
किरतपुर से आनंदपुर की तरफ नरम चढ़ाई है लेकिन थकान के मारे हमने आराम-आराम से साइकिल चलना शुरू कर दिया |
किरतपुर से आनंदपुर की तरफ बढ़ते हुए गुरद्वारों के नाम सिख हिस्ट्री की कहानियां याद दिला देते हैं | आनंदपुर साहिब के दर्शन हुए तो हम जोश से भर गए | करीब 7:30 बजे हम अपनी मंजिल पे पहुंचे |

 
आनंदपुर साहिब पहुंच कर साइकिल पार्किंग में गड़े एक खम्भे से बांध दिए गए और माथा टेकने चल पड़े | माथा टेक कर रहने का इंतजाम किया गया |सराय में तीन लोगों के लिए कमरा लिया सिर्फ 100 रूपए में मिल गया | कमरे में सामान रखने के बाद लंगर छका |
पेट पूजा के बाद कमरे में वापिस कर तो हम घोड़े बेच कर सो गए |