Monday, 22 August 2016

भद्रवाह, (जिला डोडा जम्मू एवं कश्मीर) कैलाश यात्रा भाग-1


पहाड़ों के जिस्मों पे बर्फ़ों की चादर
चिनारों के पत्तों पे शबनम के बिस्तर
हसीं वादियों में महकती है केसर
कहीं झिलमिलाते हैं झीलों के जेवर
यहाँ के बशर हैं फ़रिश्तों की मूरत
यहाँ की जु़बाँ है बड़ी ख़ूबसूरत
यहां की फ़िजाँ में घुली है मुहब्बत
यहाँ की हवाएँ मुअत्तर-मुअत्तर
सुखन सूफ़ियाना, हुनर का खज़ाना
अजानों से भजनों का रिश्ता पुराना
ये पीरों, फ़कीरों का है आशियाना
यहाँ सर झुकाती है कुदरत भी आकर...
(आलोक श्रीवास्तव द्वारा रचित कविता -"है कश्मीर धरती पे जन्नत का मंज़र" में से लिया गया)
यात्रा का सारा प्रोग्राम महीना पहले से ही सेट था | शारीरिक रूप से फिट था; लेकिन मानसिक रूप से मैं पूरी तरह से फिट था, कि नहीं ये तो मैं नहीं बोल सकता था | जम्मू और कश्मीर ये शब्द सुनते ही दिमाग में आतंकवाद का ख्याल आता है | चलिए जम्मू और कश्मीर की बात चली है तो मुझे पुरानी बात याद आ गई | बात 2007 की है जब मेरी बहन कश्मीर में NIT श्रीनगर में पड़ती थी | अक्सर फोन पे रोया करती थी | तब मैं उसका मज़ाक उड़ाया करता था | मैं सोचता था कि शायद उसे घर की याद आती होगी तो रोती होगी लेकिन कश्मीर की समस्या उस समय इतनी गंभीर थी कि मेरी बाल्यबुद्धि की समझ में न आ सके |
खैर अब यात्रा पे आता हूँ | 16 अगस्त को शाम 6 बजे मैं अपनी साइकिल उठा के घर से पठानकोट के लिए निकल पड़ा |
मेरे घर इंदपुर(इंदौरा) से पठानकोट लगभग 24 Km दूर होगा | 7:15 बजे पठानकोट पहुँच गया |
अपनी मौसी के घर साइकिल खड़ी करके और चाय पानी पीने के बाद करीब 8 बजे पठानकोट बस स्टैंड पहुँच गया | वहां गुरूजी पहले ही पहुँच चुके थे | हमने जम्मू की बस का पता किया तो पता चला अगली बस रात 1 बजे आने वाली थी | समय व्यतीत करने के लिए हम खाना खाने चले गए |
करीब 11 बजे वापिस बसस्टैंड आये | एक बेंच पे सामान रख कर लेट गए | बातों बातों में 1 बज गया और राजस्थान रोडवेज की बस भी आ गई | हम बस में चढ़े तो देखा की दूसरी कतार में तीन वाली सीट ख़ाली है; हम अपना सामान वहां रखने ही वाले थे कि कंडक्टर बोला वहां मत बैठो वहां मैं सोऊंगा |
हैं!!! हैं! भाईसाब क्या ?
वो फिर से बोला वहां सोऊंगा मैं !!!!
गुरूजी और मेरी हंसी छूट गयी |
साला ऐसा कंडक्टर पहली बार देखा रे;
सवारी को बोलता है सीट पे मत बैठो वहां मैं सोऊंगा ????
घोर कलयुग आ गया है !!!
खैर हम दो वाली सीट पे बैठ गए और बस चल पड़ी | 93 रुपए प्रतिव्यक्ति, जम्मू तक का टिकेट भी ले लिया | सुबह करीब 3 बजे हम जम्मू पहुंचे | वहां से हम दो चौक दूर डोडा, किश्तवाड़, पाडर और भद्रवाह जाने वाली गाड़ियों के स्टैंड तक पैदल चले गए |
जी हाँ डोडा किश्तवाड़ पाडरररररररररररररर
यही चिल्ला चिल्ला के बोला जा रहा था ताकि कोई सवारी घर में सोई भी हो तो उठ के आ जाए |
करीब 3:30 बजे हम डोडा, किश्तवाड़ और पाडर जाने वाली गाड़ी में बैठ गए | थोड़ी ही देर बाद 2X2 सीट्स वाली हमारी छोटी बस फुल हो गई और चल पड़ी | जम्मू से उधमपुर और उधमपुर से पत्नीटॉप पहुँचे |
ड्राइवर बस इतनी तेज चला रहा था की सारे रास्ते हमारी जान हलक में ही अटकी रही | उतराई में भी एक्सीलेटर दबा के रख रहा था | अगर बस के पंख लगे होते तो टेकऑफ हो गया था समझो !!
पत्नीटॉप की चढाई पे बस का टायर पंक्चर हो गया | शायद अत्याधिक गति के आगे बेबस हो गया था बेचारा |
खैर थोड़ी ही देर में टायर बदल दिया गया | अब तक सूर्य उदय हो चुका था |
पत्नीटॉप पर्वतीय वनस्पति से भरपूर एक अति रमणीय पर्यटन स्थल है |
पत्नीटॉप पार करके हम बटौत पहुंचे, वहां से श्रीनगर जाने वाली सड़क से अलग हो गए और डोडा की तरफ दायीं (right) ओर मुड़ गए |
बटोत से सेओत और सेओत से गोहा होते हुए हम पुल डोडा पहुंचे | पुल डोडा से दो रास्ते अलग हो जाते हैं; एक रास्ता चेनाब पे बने पुल से पार जाते हुए किश्तवाड़, पाडर की तरफ जाता है और दूसरा रास्ता सीधा भद्रवाह की ओर | हमने जम्मू से पुलडोडा की टिकेट ली थी तो हम यहीं उतर गए | जम्मू से पुल डोडा का किराया = 190 रुपए (प्रतिव्यक्ति) |
पुल डोडा से हम एक टाटासुमो में भद्रवाह पहुंचे जो की वहां से 30 Km ही दूर था | करीब 9:30 बजे हम भद्रवाह पहुँच चुके थे |
भद्रवाह के सेरी बाज़ार में हम उतरे | उतरते ही चारों ओर नज़र दौड़ाई तो भद्रवाह के प्राकृतिक सौंदर्य ने मन मोह लिया | ईमारत के नीचे दुकाने और ऊपर घर, अपने अपने काम में व्यस्त लोग, बोझा ढ़ोते खच्चर, पहरा देते सेना तथा J&K पुलिस के जवान;
जी हाँ जवान, जिनके हाथ में बन्दूक है और नज़रें हर गतिविधि पर | सलाम है इन जवानों को जिनके कारण भद्रवाह काफी समय से शांत बना हुआ है जबकि कश्मीर में अब भी कर्फ्यू लगा है | मन तो बहुत किया कि फोटो खींच लूँ लेकिन देश की आंतरिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मैंने कोई चित्र नहीं उतारा | वैसे भी भद्रवाह कि सुंदरता का असली स्वाद तो वहां जा के देखने में ही है | ऐसे ही थोड़ी न इस जगह को "छोटा कश्मीर" कहा जाता है !!!
अगर जा रहे हों तो पहचान पत्र ले के जाना न भूलें और इसे हमेशा अपने पास रखें |
सबसे पहले वासुकि नाग जी के मंदिर में जा के माथा टेका | पुजारी जी से बात की तो पता चला की आज कैलाश जाना संभव नहीं हो पाएगा | हमने उनसे रहने के स्थान के बारे में पूछा तो उन्होंने हमें गुप्त गंगा मंदिर में जाने का निर्देश दिया | गुप्त गंगा मंदिर पहुँच कर सर्वप्रथम साथ बहने वाले नीरू नाले में स्न्नान किया, माथा टेका और सारी थकान मिटाई |
मंदिर में रहना हमें अच्छा नहीं लग रहा था तो हमने वापिस सेरी बाजार जा कर नीचे कि तरफ लक्ष्मी नारायण जी के मंदिर के पीछे, राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ के कार्यालय में रहने का निर्णय किया | कार्यालय में विश्राम करने के पश्चात शाम को हम सेरी बाजार घूमने निकले | हमारा मकसद तो सुबह कैलाश यात्रा के श्रीगणेश स्थान छत्रगाला तक जाने वाली गाड़ियों के बारे में पता करना था |
कुछ पूछताछ के बाद सुबह 9 बजे और फिर 10 बजे बणी कि ओर जाने वाली मेटाडोर का पता चला | एक टैक्सी वाले से मोलभाव करने के पश्चात वो 1200 रुपए में चलने के लिए तैयार हो गया | सेरी बाज़ार में खाना खाने के पश्चात वापिस कार्यालय जा के सो गए |
दो लोगों के खाने का खर्च = 200 रुपए |
सुबह 6 बजे तैयार हो के हम सेरी बाजार पहुँच गए | टैक्सी वाले को फ़ोन किया तो वह सो रहा था उसे जल्दी आने को कहा | इंतज़ार करते करते 7 बज गए | जम्मू जाने के लिए बसें लगीं थी लेकिन कोई भी बणी कि तरफ नहीं जा रहा था |
आज के ही दिन चनौत मंदिर से मिचेल यात्रा भी शुरू हो रही थी और राखी का त्यौहार भी था | सेरी बाजार में भक्तों और उनकी गाड़ियों कि भीड़ बढ़ती ही जा रही थी |
8 बजे एक पुलिस वाले ने एक ड्राइवर को हमारे पास भेजा जो कि बणी कि तरफ जा रहा था | हमने उससे किराया पूछा तो उसने बताया 100 रुपए सवारी | हमारा टैक्सी वाला अभी तक नहीं आया था तो हमने उसका प्रोग्राम कैंसिल किया और इसकी गाड़ी में बैठ गए | ये वाली गाड़ी 9 बजे चलने वाली थी | 1000 रुपए बचने के लिए एक घंटे का इंतज़ार तो किया ही जा सकता था |
9 बजे गाड़ी चली और कुछ दूर बसे सार्टिंगल गांव में रुक गई | सवारी कम होने कि वजह से यह ड्राईवर जाना नहीं चाहता था | खैर 10 बजे मेटाडोर आयी और हम उसमें चढ़ गए |


ये मेटाडोर 11 बजे चली और 1 बजे तक हम अपने यात्रा श्रीगणेश स्थान छतरगाला पहुँच ही गए |
यहाँ एक फौजी चौकी है | सड़क से ऊपर कि तरफ चढ़ के चौकी के साथ मंदिर है | चौकी के सामने कि तरफ कैलाश जाने का रास्ता है | फौजी भाइयों को अलविदा कह कर हम कैलाश कि ओर चल दिए |

‘पंजाल राज जिस धरती दे, पैरें इच सीस नुआंदा ऐ,
अऊँ उस मुल्खे दा पैंछी आँ जो डुग्गर देस खुआंदा ऐ।’
(जिसके चरणों में पंचाल राजा भी सिर झुकाते हैं, जो डुग्गर देस के नाम से जाना जाता है मैं उसी देस का पक्षी हूँ)
उत्थैं गैं शिव ते गौंरां ने, ब्याह अपना बेई रचाया सा
उत्थैं गैं बीर बरागी नै, घर अपना आई बनाया सा
उत्थै गैं बाबा जित्तो नैं, सिर हक्के पिच्छे दित्ता सा
पर फूकी दस्सेया इक बारी ज़ुल्मे दा उसने पिता सा’
-किशन स्मैलपुरी
अगले भाग में पढ़िए पहाड़ी कुत्ते द्वारा हमारा रोमांचक स्वागत................



16 comments:

  1. वाह बहुत खूबसूरत नज़ारे है। आप जो शेरों शायरी कविताओं का इस्तेमाल करते हो क्या गजब 👌👌👌👍👍👍

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  2. बहुत सुन्दर ।

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  3. जी बस आप सब का आशीर्वाद है |

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  4. Bahut hi achchi post share ki hai aapne subah subah ise padh kar man khus ho gaya

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  5. भद्रवाह कैलास कुण्ड के बारे में पहली बार पढ़ा। पढ़कर अच्छा लगा। बढिया आलेख

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  6. साथ में चल रहे हैं ...आगे बढ़ें

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    1. जी भाग दो भी आ गया है जरूर पढ़ियेगा और अपने बहुमूल्य विचार जरूर साँझ कीजियेगा |

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  7. साथ में चल रहे हैं ...आगे बढ़ें

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  8. आगे बढ़ें जी हम भी साथ में चल रहे हैं...

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  9. आगे बढ़ें जी हम भी साथ में चल रहे हैं...

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    1. जी भाग दो भी आ गया है जरूर पढ़ियेगा और अपने बहुमूल्य विचार जरूर साँझ कीजियेगा |

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  10. जी ब्लॉग पड़ने के लिए आप सबका शुक्रिया |

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  11. और घर पे किसी को पता ही नही की सौरभ इतना अच्छा लिखने लग गया है...बहुत अच्छा..!!

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  12. बहुत खूब। इस साल मेरा भी इस यात्रा पर निकलने का इरादा पक्का है। काफी मदद मिलेगी इस ब्लॉग से।
    शुक्रिया।
    मै भी पठानकोट का रहने वाला हु दुबारा यहाँ आना हुआ तो ज़रूर बतायेगा।

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